पोषण क्या होता है ?हिंदी में ( What is Nutrition ? in Hindi )

पोषण क्या है ? What is Nutrition ? in Hindi.

 

पोषण को समझने के लिए हमें पहले ये जानना होगा कि जब हम दौड़ते हैं या किसी काम को करते हैं तो हम ऊर्जा का उपयोग करते हैं। हमारे क्रम की स्थिति के अनुरक्षण करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर में वृद्धि, विकास, प्रोटीन संश्लेषण  आदि सभी क्रियाओं के लिए हमें बाहर से भी पदार्थों की आवश्यकता होती है। यही ऊर्जा का स्त्रोत या पदार्थ जिसका हम सेवन करते हैं पोषण या भोजन कहलाता है।

सजीव अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं ?

सभी जीवधारियों में ऊर्जा की आवश्यकता सामान होती है परन्तु इसकी आपूर्ति अलग-अलग जीवों में विभिन्न विधियों द्वारा होता है। जिनमें से कुछ जीव अकार्बनिक स्त्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड  तथा जल के रूप में सरल पदार्थ ( ऊर्जा ) प्राप्त करते हैं। ऐसे जीव स्वपोषी होते हैं जिनमें सभी हरे पौधे तथा कुछ जीवाणु सम्मिलित हैं। अन्य जीव जटिल पदार्थों का उपयोग करते हैं। इन जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में खंडित या परिवर्तित करना अनिवार्य है जिससे कि ये जीव अपने समारक्षण तथा वृद्धि में उपयोग कर सकें। जटिल से सरल पदार्थ के रूप में प्राप्त करने के लिए जीव जैव-उत्प्रेरक का प्रयोग करते हैं जिसे ‘एंजाइम’ कहते हैं। विषमपोषी जीव अपनी जीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वपोषी जीवों पर आश्रित होते हैं। जंतु तथा कवक इसी प्रकार के विषमपोषी जीवों में शामिल हैं।

पोषण के आधार पर जीवों के प्रकार ( Types of Organisms based on Nutrition )-

 

स्वपोषी पोषण ( Autotrophic Nutrition ) –

स्वपोषी जीवों की कार्बन तथा ऊर्जा की आवश्यकताएँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा पूरी होती हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में स्वपोषी बहार से लिए गए पदार्थों को ऊर्जा संचित रूप में परिवर्तित कर देता है। ये पदार्थ कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल के रूप में लिए जाते हैं जो स्वपोषी जीवों द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बोहइड्रेट में परिवर्तित कर दिया जाता है। परिवर्तित कार्बोहइड्रेट पेड़-पौधों को ऊर्जा प्रदान करने में उपयुक्त होते हैं। जो कार्बोहइड्रेट तुरंत प्रयुक्त नहीं होते हैं उन्हें मंड के रूप में संचित कर लिया जाता है। मंड, रक्षित ऊर्जा की तरह कार्य करता है जो पेड़-पौधों द्वारा आवश्यकतानुसार प्रयुक्त कर लिया जाता है। जब हम भोजन करते हैं तो हमारे द्वारा खाये गये भोजन से व्युत्पन्न ऊर्जा का कुछ भाग हमारे शरीर में ग्लाइकोजन के रूप में संचित कर लिया जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को रासायनिक अभिक्रिया के रूप में निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है –

6CO2 + 12H2O  ➜ C6H12O6 + 6O2 + 6H2

PHOTO SYNTHESIS REACTION

ये रासायनिक अभिक्रिया पौधों में उपस्थित क्लोरोफिल और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होता है।

प्रकाश संश्लेषण अभिक्रिया के दौरान निम्नलिखित घटनाएं होती हैं –

  1. क्लोरोफिल द्वारा प्रकश ऊर्जा को अवशोषित करना।
  2. प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में  करना तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन।
  3. कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन।

 

एक पत्ती की अनुप्रस्थ काट को सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करने पर मिला कि कुछ कोशिकाओं में हरे रंग के बिंदु दिखाई देते हैं। ये हरे बिंदु कोशिकांग हैं जिन्हें ”क्लोरोप्लास्ट” कहते हैं और इनमे क्लोरोफिल होता है जिस कारण से इनका रंग हरा होता है।

पौधों की पत्तियों की सतह पर सूक्ष्म छिद्र होते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए गैसों का अधिकांश आदान-प्रदान इन्हीं छिद्रों के द्वारा होता है। इसके अलावा गैसों का आदान-प्रदान तने, जड़ और पत्तियों की सतह से भी होता है। इन रंध्रों से अधिक मात्रा में जल की हानि भी होती है। जब प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता नहीं होती है तब पौधा इन छिद्रों को बंद कर लेता है। छिद्रों को बंद करना और खोलना ”द्वार कोशिकाओं” का एक कार्य होता है। द्वार कोशिकाओं में जल जब अंदर जाता है तब वे फूल जाती हैं और रंध्र का छिद्र खुल जाता है। इसी तरह जब द्वार कोशिकाएं सिकुड़ती हैं तो छिद्र बंद हो जाता है।

 

स्वपोषी अपने ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए और अपने शरीर के निर्माण के लिए अन्य कच्ची सामग्री की आवश्यकता होती है। स्थलीय पौधे प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक जल की पूर्ति जड़ों द्वारा मिट्टी में उपस्थित जल के अवशोषण से करते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस, लोहा तथा मैग्नीशियम जैसे अन्य पदार्थ भी मिट्टी से लिए जाते हैं। नाइट्रोजन एक ऐसा तत्व है जिसका उपयोग प्रोटीन तथा अन्य यौगिकों के संश्लेषण में किया जाता है। इसे अकार्बनिक नाइट्रेट का नाइट्राइट के रूप में लिया जाता है। इसे उन अकार्बनिक पदार्थों के रूप में लिया जाता है जिन्हें जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन से बनाते हैं।

 

विषमपोषी/परपोषी पोषण ( Heterogeneous Nutrition ) –

ऐसे जीवधारी जो अपना पोषण करने के लिए दूसरे जीवों ( शाक-सब्जी, जानवरों के मांस आदि ) पर निर्भर हों, उन्हें विषमपोषी जीव कहते हैं तथा इस प्रकार के पोषण को विषमपोषी पोषण कहते हैं। जीवों द्वारा भोजन ग्रहण करने और उसके उपयोग की अनेक युक्तियाँ हैं। कुछ जीव भोज्य पदार्थों का विघटन शरीर के बाहर ही कर देते हैं और उसके बाद उसका अवशोषण करते हैं। फफूँदी, यीस्ट तथा मशरूम आदि कवक इसके उदाहरण हैं। अन्य जीव सम्पूर्ण भोज्य पदार्थ का अंतर्ग्रहण करते हैं तथा उसका पाचन शरीर के अंदर होता है जैसे मनुष्य, बकरी, गाय, कुत्ता, मगरमच्छ आदि।

जीव द्वारा भोजन का अंतर्ग्रहण तथा पाचन विधि उसके शरीर की संरचना तथा कार्यविधि के आधार पर होती है। कुछ अन्य जीव पौधों और जंतुओं को बिना मारे उनसे पोषण प्राप्त करते हैं। उदहारण के लिए अमरबेल, किलनी, जूँ, लीच और फीताकृमि आदि जीव अपना पोषण उस जीव के संपर्क में रहकर करते हैं। आपने देखा होगा कि बरगद या पीपल के वृक्ष के तनों और शाखाओं में लम्बी श्रृंखला वाले रस्सीनुमा जो टहनी लटकती रहती है वही अमरबेल है।

 

जीव अपना पोषण कैसे करते हैं ? ( How do Organisms nourish ? in Hindi. )

विभिन्न जीवधारियों में भोजन और उसके अंतर्ग्रहण की विधि भिन्न-भिन्न है अतः उनके पाचन तंत्र भी अलग-अलग हैं। एककोशिकीय जीवों में भोजन सम्पूर्ण सतह से लिया जाता है। लेकिन जीवों की जटिलता बढ़ने के साथ-साथ भिन्न-भिन्न कार्य करने वाले अंग भी विशिष्ट ( बढ़ जाते हैं ) हो जाते हैं। उदहारण के लिए, अमीबा ( अनिश्चित आकर वाला जीव ) कोशिकीय सतह से अपने अँगुली जैसे अस्थायी प्रवर्ध की सहायता से भोजन को ग्रहण करता है। यह प्रवर्ध ( पादाभ/कूटपाद ) भोजन के कानों को घेर लेते हैं और संगलित होकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं। खाद्य रिक्तिका में जटिल पदार्थों का विघटन सरल पदार्थों में हो जाता है और वे कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाते हैं। बचा हुआ अपच पदार्थ कोशिका की सतह की ओर गति करता है तथा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

पैरामीशियम भी एककोशिकीय जीव है लेकिन इसका आकार निश्चित होता है। यह जीव अपना भोजन एक विशिष्ट स्थान से ही ग्रहण करता है। इन जीवों में भोजन इस स्थान तक पक्ष्याभ की गति के द्वारा पहुँचता है जो कोशिका की पूरी सतह से ढके होते हैं।

 

मनुष्यों में पोषण ( Nutrition in Humans ) –

 

आहार नाल मूल रूप मुँह से गुदा तक फैली हुई एक लम्बी नली है। हम तरह-तरह  का सेवन करते हैं जो भोजन नली से गुजरता है। प्राकृतिक रूप से भोजन को एक प्रक्रिया से गुजरना होता है जिससे कि वह छोटे-छोटे कणों ने बदल जाता है। इसे हम अपने दाँतों से चबाकर पूरा कर लेते हैं। आहार नाल का आस्तर ( आंतरिक भाग ) बहुत कोमल होता है ; अतः भोजन को गीला किया जाता है जिससे कि इसका मार्ग आसान हो जाये।

जब हम कोई ऐसी चीज कहते हैं या देखते हैं तो हमारे मुँह में पानी आ जाता है। यह वास्तव में केवल जल नहीं है, यह ‘लाला ग्रंथि’ से निकलने वाला एक रस है जिसे ‘लालरस’ या ‘लार’ ( Saliva ) कहते हैं। जो भोजन हम खाते हैं उसकी जटिल रचना के कारण उसका अवशोषण आहार नाल द्वारा होता है जिसमें भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित किया जाता है। यह काम जैव-उत्प्रेरक के द्वारा किया जाता है जिन्हें हम ‘एंजाइम’ कहते हैं। लार में भी एक एंजाइम होता है जिसे ‘लार एमिलेस’ कहते हैं, यह मंड के जटिल अणुओं को सरल शर्करा में खंडित कर देता है। भोजन को चबाने के दौरान पेशीय जिह्वा ( जीभ ) भोजन को लार के साथ पूरी तरह मिला देती है।

Digestive System

चित्र : मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)

             आहार नली के हर भाग में भोजन की नियमित रूप से गति उसके सही ढंग से प्रक्रमित होने के लिए आवश्यक है। यह क्रमाकुंचन गति पूरी आहार नली ( भोजन नली ) में होती है।

हमारे मुँह से अमाशय तक भोजन ‘ग्रसिका’ या ‘इसोफेगस’ द्वारा ले जाया जाता है। अमाशय एक वृहत अंग है जो आने पर स्वतः फैल जाता है। अमाशय की पेशीय भित्ति भोजन को अन्य पाचक  मिलाने में सहायता प्रदान करती है।

ये पाचन कार्य अमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रंथियों के द्वारा संपन्न होता है। जठर ग्रंथियों में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCl ), एक प्रोटीन पाचक एंजाइम पेप्सिन ( C6H6Cl6 ) तथा श्लेष्मा का श्रावण होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एक अम्लीय माध्यम तैयार करता है जो पेप्सिन एंजाइम की क्रिया में सहायक होता है। सामान्य स्थितियों में श्लेष्मा अमाशय के आंतरिक आस्तर की अम्ल से रक्षा करता है।

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